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छठ पूजा क्या है क्यों मनाते है?

छठ पूजा क्या है क्यों मनाते है

छठ पूजा क्या है क्यों मनाते है? : हमारे देश में सूर्य उपासना के लिये प्रसिद्ध छठ पूजा को दीपावली के छठे दिन मनाया जाता है यह पूजा प्रमुख रूप से भगवान् सूर्य को अर्पित है और इस दिन सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ पर्व या छठ पूजा या छठ व्रत कहते है.

छठ पर्व को एक साल में दो बार मनाया जाता है पहली बार चैत्र और दूसरी बार कार्तिक के महीने में, चैत्र मास की शुक्ल पक्ष षष्ठी को मनाई जाने वाली छठ पूजा को चैती छठ और कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष षष्ठी को मनाई जाने वाली पूजा को कार्तिकी छठ कहा जाता है.

इस पर्व को परिवार की ख़ुशी और सुख समृध्दि और मनचाहे फल (वरदान) प्राप्ति के लिये मनाया जाता है इसे स्त्री व पुरुष दोनों सामान रूप से मानते है कहा जाता है की इस व्रत को संतान सुख प्राप्ति के लिये भी रहा जाता है, तो आइये अब हम आपको बताते है की कैसे इसकी पूजा होती है और आपके मन के सभी भ्रम हम दूर करने की कोशिश करेगे.

सच्ची श्रद्धा का पर्व है “छठ पूजा”

कहा जाता है की छठ पूजा एक कठिन तपस्या की तरह होती है जिसको ज्यादातर महिलाये ही करती है पर इसे कुछ पुरुष भी करते है क्योकि छठ पूजा को सभी कर सकते है इसमें किसी भी य्त्ढ़ का भेदभाव नही है इसे कठिन इसलिए कहा जाता है क्योकि व्रतधारी न सिर्फ अपना भोजन त्याग करते है बल्कि चार दिनों के लिये अपने सुखद जीवन का भी त्याग करते है.

इस पर्व के लिये के अलग से कमरा तैयार किया जाता है और व्रतधारी उसी कमरे में चादर या कम्बल के सहारे रात व्यतीत करते है और व्रत करने वाले लोग नये कपडे जिनकी कभी सिलाई न की गयी हो ऐसे वस्त्र धारण करते है.

ज्सिके लिये महिलाये साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ पर्व मानते है इस पर्व की ये मानता है की अगर आपने शुरू कर दिया तो आपको कई सालो तक करना होगा ऐसा नही की आपने एक साल कर दिया और फिर छोड़ दिया.

ये तब तक किया जाता है जब तक की अगली पीढ़ी में किसी विवाहित महिला या पुरुष को इसके लिये तैयार न कर लिया जाये अगर घर में कोई मृत्यु होती है तो यह पर्व नही मनाया जाता है.

कैसे होती है छठ पूजा?

छठ पूजा पूरे चार दिनों तक मनाई जाती है और इसका आरंभ कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को होता है और इसका समापन कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होता है तथा चैत्र की छठ पूजा की शुरुआत चैत्र शुक्ल चतुर्थी तथा समापन चैत्र शुक्ल सप्तमी को होता है.

लोग इन चार दिनों में पूरे तीन दिन यानि 36 घंटे तक व्रत रहते है और इस दौरान वो पानी तक नही पीते है कुछ खाने की बात तो आती ही नही है इसमें.

पहला पड़ाव – नहाय खाय

छठ पर्व का पहला दिन नहाय खाय के रूप में मनाया जाता है सबसे पहले घर को साफ करके उसे पूरी तरह पवित्र बनाया जाता है और फिर छठ व्रती स्नान करके शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण करते है और इसके बाद व्रत की शुरुआत की होती है.

और घर के बाकि सदस्य जो की व्रत नही रखना चाहते है वो व्रत रखने वाले के भोजन ग्रहण करने के बाद ही भोजन ग्रहण करते है. और व्रत रखने वाले के लिये भोजन के रूप में केवल कद्दू दाल और चावल ही खाते है और और ये दाल केवल चने की होती है.

दूसरा पड़ाव – खरना

व्रत के दुसरे दिन जब पंचमी होती है तब व्रत करने वाले पूरे दिन का व्रत रखते है और इस बीच वो भोजन और पानी दोनों ही नही ग्रहण करते है और शाम को ही भोजन ग्रहण करते है इसे खरना कहते है.

जब खरना होता है तो आस पास के सभी लोगो को प्रसाद लेने के लिये आमंत्रित किया जाता है प्रसाद में गन्ने के रस से बनी हुई चावल की खीर के साथ दूध, और चावल का पिठ्ठा और घी से चुपड़ी हुई रोटियां होती है.

प्रसाद में नमक और चीनी का उपयोग नही किया जाता है और प्रसाद बनाते समय स्वच्छता का पूरा ध्यान रखा जाता है क्योकि प्रसाद पवित्र होना चाहिए.

तीसरा पड़ाव – संध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य की पूजा)

तीसरे दिन जब षष्ठी होती है तब उस दिन छठ प्रसाद का निर्माण किया जाता है जिसमे ठेकुआ (टिकरी) के साथ चावल के लड्डू (लडुआ) बनाया जाता है, इसके आलावा चढ़ावा के लिये लाये गये साँचे और फल भी छठ प्रसाद में शामिल किये जाते है.

इस दिन शाम को पूरी तयारी के साथ और एक बांस की टोकरी में अर्ध्य के लिये सूप (लकड़ी का) सजाया जाता है और व्रतधारी लोग अपने परिवार के साथ और पड़ोस के लोग भी सूर्य भगवान को अर्घ्य देने घाट की ओर जाते है.

जितने लोग छठ का व्रत रखते है वो किसी तालाब या नदी के किनारे इकठ्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान करते है और भगवान सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य अर्पित करते है और फिर छठी माता के प्रसाद से भरे सूप की पूजा करते है और इस दौरान यहाँ मेले जैसे दृश्य होता है. जो बहुत ही सुहावना होता है.

चौथा पड़ाव – सुबह का अर्घ्य (उगते सूर्य की पूजा)

चौथे दिन जब शुक्ल सप्तमी होती है उस दिन की सुबह ही उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है जप लोग व्रत करते है वो फिर से उसी स्थान पर इकठ्ठा होते है जहा उन्होंने शाम को पूजा की थी और फिर पिछले शाम को की गयी पूजा विधि को दोहराया जाता है और अंतिम में कच्चे दूध का शरबत और पासद खाकर अपना व्रत पूरा करते है.

छठ पूजा के बारे में लोक कथाये

छठ पूजा की लिये लोगो की कई तरह की मान्यताये है जिनमे से मुख्य हम आपको यहाँ बतायेगे.

रामायण के अनुसार छठ पूजा

कहा जाता है की लंका विजय पर रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम के लिये माता सीता ने उपवास किया था और सूर्य देव की उपसना की थी और सप्तमी को पुनः अनुष्ठान करके सूर्यदेव का आशीर्वाद प्राप्त किया था.

महाभारत के अनुसार छठ पूजा

कहा जाता है की छठ पूजा महाभारत काल में प्रारम्भ हुई सबसे पहले सुर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा की क्योकि कर्ण सुर्यदेव के परम भक्त थे जो कई घंटो तक पानी में खड़े रहकर सूर्यदेव की अर्चना करते थे जिसकी वजह से वह महान योद्धा बने थे.

छठ पूजा का शुभकामना सन्देश

छठ का आज है पावन त्यौहार

सूरज की लाली, माँ का है उपवास

जल्दी से आओ अब करो न विचार

छठ पूजा का खाने तुम प्रसाद

छठ पूजा की शुभकामनाये.

भावपूर्ण छठ पूजा के लिये गीत

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A Little Introduction Of

Rajaneesh Maurya

रजनीश मौर्या blog4help के डिजाईन, डेवेलपमेंट और सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन के विशेषज्ञ है, ये इस साईट के एडमिन भी है| इन्हें वेबसाइट ऑप्टिमाइज़ करना और आर्टिकल लिखना बहुत ही पसंद है|

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