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महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवन परिचय, शिक्षा और महान कार्य

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महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवन परिचय | Dayanand Saraswati Biography in Hindi

आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती को एक महान देशभक्त और मार्गदर्शक के रूप  जाना जाता है जिन्होंने अपने कार्यों से भारतीय समाज को नयी दिशा दिखायी, महात्मा गाँधी भी इनके विचारों से बहुत प्रभावित थे.

इन्होने अपने जीवन में वेदों और उपनिषदों का खूब अध्ययन किया और उस ज्ञान से दुनिया भर को लाभान्वित किया, इन्होने मूर्ति पूजा को व्यर्थ बताया निरंकार ओमकार में भगवान का अस्तित्व है कहकर इन्होने वैदिक धर्म को सर्वश्रेष्ठ बताया.

स्वामी जी ने सन 1875 में आर्य समाज की स्थापना की, 1857 की क्रांति में भी इन्होने डटकर हिस्सा लिया और अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुके नही और उनके खिलाफ एक षडयंत्र के चलते 30 अक्टूबर 1883 को इनकी मृत्यु हो गयी.

महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवन परिचय | Dayanand Saraswati Biography in Hindi

मूल नाम – मूलशंकर तिवारी

जन्म – 12 फ़रवरी 1824

माता – अमृत बाई

पिता – अम्बाशंकर तिवारी

शिक्षा – वैदिक ज्ञान

गुरु – विरजानंद

कार्य – समाज सुधारक, आर्य समाज के संस्थापक

मृत्यु – 30 अक्टूबर 1883

स्वामी जी प्राथमिक नाम मूलशंकर तिवारी था इनका जन्म 12 फ़रवरी 1824 को टंकारा, गुजरात में हुआ था यह एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे इनके पिता एक समृध्द व्यक्ति थे जो नौकरी पेशा करते थे इसलिए परिवार में आर्थिक रूप से कोई भी समस्या नही थी.

कहा जाता है की किसी घटना के कारण इनके जीवन में एक ऐसा बदलाव आया की उसके बाद ये 1846 मतलब मात्र 21 वर्ष की उम्र में ही सन्यासी जीवन का चुनाव किया और घर से निकल गये, ये जीवन की सच्चाई जानना चाहते थे जिस की वजह से इन्हें सांसारिक जीवन व्यर्थ लग रहा था.

इनकी जीवन की सच्चाई जानने की इच्छा इतनी ज्यादा प्रबल थी की इन्होने अपने विवाह के लिये भी मना कर दिया जिसके कारण इनके पिता और स्वामी जी के बीच कर बार झगडे नभी हुए पर अन्ततः इनके पिता जी को झुकना पड़ा.

दयानंद सरस्वती का जीवन में बदलाव लाने वाली घटना

ये एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे जिसके कारण इनके परिवार में हमेशा धार्मिक अनुष्ठान होते रहते थे, तब एक बार महाशिवरात्रि के दिन इनके पिता ने इनसे उपवास करके पूरी विधिपूर्वक पूजा करने के कहा और साथ ही रात्रि जागरण व्रत का पालन करने के लिये भी कहा.

पिता जी के आदेशानुसार मूलशंकर तिवारी ने उपवास करके पूरा दिन उपवास का पालन भी किया और रात्रि के समय रात्रि जागरण के लिये शिव मंदिर में ही पालकी लगाकर बैठ गये तब उन्होंने आधी रत को एक दृश्य देखा जिसमे उन्होंने देखा कि चूहों का एक झुण्ड शिव जी की मूर्ती को घेरे हुए प्रसाद खा रहा है.

तब मूलशंकर तिवारी के मन के एक सवाल आया की यह भगवान कैसे हो सकते है यह तो मात्र एक पत्थर की मूर्ती है जो अपनी स्वयं की रक्षा नही कर सकती है उससे हम क्या अपेक्षा कर सकते है और तब से ये जीवन की सच्चाई जानने के लिये उत्सुक हो गये और अपना घर छोड़ दिया और बाद में अपने खुद के ज्ञान से ही ये मूलशंकर तिवारी से दयानंद सरस्वती बने.

1857 की क्रांति में योगदान

1846 में घर छोड़ने के बाद दयानंद सरस्वती जी ने सबसे पहले अंग्रेजो के विरुद्ध बोलना शुरू किया उन्होंने भारत में भ्रमण करते समय एक चीज़ यह देखि थी की देश में आज़ादी को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बहुत गुस्सा है अगर उन्हें सही मार्गदर्शन मिल जाये तो भारत जल्द ही आजाद हो जायेगा.

इसलिए उन्होंने लोगो के एकत्र करने और एक दुसरे से जोड़ने का कार्य शुरू किया जिससे स्वामी जी से उस समय के महान महान क्रन्तिकारी तात्या टोपे, नाना साहेब पेशवा, हाजी मुल्ला खां आदि बहुत प्रभावित हुए और ये लोग भी स्वामी जी के मार्गदर्शन में ही कार्य करने लगे. फिर ये मिलकर लोगो को जागरूक करने लगे और एक दुसरे के लिये सन्देश वाहक बने जिससे आपसी रिश्ते मज़बूत हुए और लोगो में एकता हुई तथा इस कार्य के लिये उन्होंने एक योजना चलायी जिसका नाम रोटी और कमल योजना नाम दिया जिसमे सबसे पहले साधू महात्माओ को जोडा गया जिससे देश की जनता को जागरूक करने में मदद मिली.

भले ही 1857 की क्रांति सफल न हुई पर स्वामी जी निराश नही हुए उन्होंने यह बात सबको कही और समझाया की हम कई वर्षों से गुलाम है जिसके कारण हमें एक ही प्रयास में आज़ादी नही मिल सकती है अभी इसके लिये उतना ही समय लग सकता है जितना की हमने गुलामी की है. उन्होंने लोगो को यकीन दिलाया की आज नही तो कल हमें आज़ादी जरुर मिल जाएगी क्योकि ये लड़ाई एक बड़े पैमाने पर शुरू हो चुकी है और स्वामी जी ने यह हौसला सबमे जगाये रखा तथा इस क्रांति के बाद स्वामी जी अपने गुरु विरजानंद जी के पास जाकर वैदिक ज्ञान प्राप्त करने लगे और देश में नये नये विचारो का संचार करने लगे.

जीवन में गुरु का महत्त्व

ज्ञान की प्राप्ति के लिये जब ये घर से निकले तब ये स्वामी विरजानंद जी से मिले और उन्हें अपना गुरु बनाया इन्होने ने ही दयानंद सरस्वती जी को वैदिक शास्त्रों का अध्ययन करवाया और योग शास्त्र का ज्ञान दिया. कहा जाता है की जब स्वामी विरजानंद जी से जब दयानंद सरस्वती जी ने गुरु दक्षिणा के लिये कहा तब विरजानंद जी ने इन्हें समाज सुधारक और समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ कार्य करने को कहा तब दयानन्द जी ने गुरु के आदेश का पालन किया और समाज सुधारक के रूप में कार्य करने लगे.

इसके लिये इन्होने पहले पूरे भारत का भ्रमण किया और वैदिक शास्त्रों का प्रचार प्रसार किया मार्ग में इन्हें कई प्रकार की कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा पर इन्होने कभी हार नही मानी और अपना मार्ग नही बदला. इन्होने सभी धर्मो के मूल ग्रंथो का अध्ययन किया और कुरीतियों का खुलकर विरोध किया.

आर्य समाज की स्थापना

वर्ष 1875 में स्वामी जी गुडी पड़वा के दिन मुंबई में आर्य समाज की स्थापना इसकी नीव परोपकार, जन सेवा, ज्ञान एवं कर्म के सिद्धांतो को केद्र में रख कर बनाई गयी थी, स्वामी जी का यह कल्याणकारी ऐतिहासिक कदम मील का पत्थर साबित हुआ शुरुआत में जो विद्वान् और और पंडित स्वामी दयानंद सरस्वती के विरोध में खड़े हुए थे परन्तु स्वामी के सटीक तार्किक ज्ञान और महान समाज कल्याण उद्देश्य की लहर के आगे उन्हें झुकना पड़ा.

स्वामी जी द्वारा किये गये कुरीतियों के खिलाफ विरोध

स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिये आवाज़ उठायी और उसमे सफल भी हुए तो अब आप जानेगे उन सभी कुरीतियों के बारे में जिनके खिलाफ महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने आवाज़ उठायी.

1 – बाल विवाह

भारतीय समाज में उस समय पर एक यह कुप्रथा हर जगह थी और उसे लगभग सभी लोग मानते थे और वह है बाल विवाह, जिसमे बच्चो का विवाह छोटी उम्र में ही कर दिया जाता था स्वामी जी ने इसके खिलाफ आवाज़ उठायी और शास्त्रों को मदद से लोगो मे जागरूकता फैलायी और उन्होंने लोगो को बताया की बाल विवाह एक ऐसी कुप्रथा है जिसके कारण मनुष्य निर्बल बनता है और निर्बलता के कारण समय से पहले मृत्यु हो जाती है.

2 – सती प्रथा विरोध

भारतीय समाज में व्याप्त यह प्रथा बहुत ही अमानवीय थी जिसमे अगर किसी स्त्री के पति की मृत्यु हो जाती थी तो उस स्त्री को भी अपने पति की चिता में जिन्दा जलना होता था दयानंद सरस्वती जी ने इसका भी बहुत विरोध किया और लोगो को प्रेम भाव से रहना सिखाया धीरे धीरे यह प्रथा भी समाप्त हो गयी.

3 – विधवा पुनर्विवाह

भारतीय समाज में व्याप्त एक ऐसी कुप्रथा जो आज भी विधवा स्त्रियों का स्तर समाज में सबके सामान नही आने दे रही है और वो है विधवा पुनर्विवाह, दयानंद सरस्वती जी ने इस कुप्रथा का बहुत विरोध किया और उस समय भी विधवा स्त्रियों के पुनर्विवाह के लिये अपना मत दिया और लोगो को विधवा पुनर्विवाह के लिये जागरूक किया.

4 – एकता का सन्देश

महर्षि दयानंद सरस्वती जी का एक स्वप्न था जो आज भी पूरा नही हुआ है, और वो ये है की वो सभी धर्म और जाति के लोगो को एक ही ध्वज तले बैठे देखना चाहते थे, उनका मानना था की लोग आपस में लड़ाई करते है जिसका फायदा हमेशा कोई तीसरा व्यक्ति उठा लेता है. इसके लिये उन्होंने कई सभाओं का आयोजन किया पर फिर भी वो हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख और इसाई धर्मों को मिला नही सकते है और आज भी यह नही हो पाया है.

5 – वर्ण भेद का विरोध

उन्होंने सदैव लोगो को यही सिखाया की शास्त्रों में वर्ण भेद नही बल्कि शास्त्रों में वर्ण व्यवस्था है जिसके अनुसार चारो वर्ण समाज को सुचारू बनाने के अभिन्न अंग है जिसमे सभी को एक सामान माना गया है कोई छोटा बड़ा नही है सभी अमूल्य है, उन्होंने सभी वर्गों को सामान अधिकार देने की बात कही है वर्ण भेद का विरोध किया.

6 – नारी शिक्षा एवं समानता

सरस्वती जी ने हमेशा नारी शिक्षा का समर्थन किया था उनका कहना था की नारी शिक्षा ही समाज का विकास है उन्होंने नारी को समाज का आधार कहा है उनका कहना था समाज के विकास के लिये नारी का शिक्षित होना बहुत ही है और आज भी कुछ क्षेत्रो में नारी शिक्षा बहुत ही पीछे है.

स्वामी जी के विरोध में षड़यंत्र

दयानंद सरस्वती जी की बढती लोकप्रियता के कारण अंग्रेजो को स्वामी जी से डर लगने लगा था की कही इनकी वजह से कही उन्हें भारत न छोड़ना पड़े जिसकी वजह से अंग्रेज स्वामी जी के कार्यो पर नज़र रखने लगे और स्वामी जी को कई बार मारने के लिये जहर भी दिया पर स्वामी योग में पारंगत थे और इसलिए उन्हें कुछ न हुआ.

पर सन 1883 में स्वामी दयानंद सरस्वती जोधपुर के महाराज राजा यशवंत सिंह के पास गये जहा पर राजा ने उनका बहुत स्वागत और सम्मान किया, एक दिन की बात है जब राजा यशवंत सिंह एक नर्तकी नन्ही जान के साथ व्यस्त थे. जब स्वामी जी ने यह देखा तो उन्होंने इसका विरोध किया और राजा को बहुत समझाया की एक तरफ तो आप धर्म से जुड़ना चाहते है और दूसरी तरफ इस तरह भोग विलासिता कर रहे है ऐसे में आपको ज्ञान प्राप्ति असंभव है.

तब स्वामी जी बाते राजा को प्रभावित कर गयी जिससे उन्होंने उस नन्ही जान से दुरी बना जिससे नाराज़ नन्ही जान ने रसोईये के साथ मिलकर स्वामी जी के खाने में कांच के टुकड़े मिला दिए जिससे स्वामी जी का स्वास्थ्य ख़राब हो गया. बाद में स्वामी जी का बहुत इलाज हुआ पर स्वामी जी का स्वास्थ्य गिरता ही गया और अंततः 30 अक्टूबर 1883 में दुनिया से विदा ले ली.

स्वामी जी का लेखन व साहित्य

स्वामी जी के प्रमुख लेखन कार्य निन्मलिखित है ये लेखन और साहित्य का स्रोत विकिपीडिया है.

  1. सत्यार्थ प्रकाश
  2. संस्कारविधि
  3. भ्रन्तिनिवारण
  4. ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका
  5. पञ्चमहायज्ञविधि
  6. अष्टाध्यायीभाष्य
  7. ऋग्वेदभाष्य
  8. आर्यभिविनय
  9. वेदांगप्रकाश
  10. यजुर्वेद भाष्य
  11. गोकरूणानिधि
  12. संस्कृतवाक्यप्रबोध
  13. चतुर्वेदविषयसूची
  14. आर्योद्देश्वररत्नमाला
  15. व्यव्हारभानु

स्वामी जी के नाम से शिक्षण संस्थान

  • महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक
  • महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर
  • डीएवी विश्वविद्यालय, जालंधर

डीएवी कॉलेज प्रबंध समिति के अंतर्गत 800 से अधिक स्कूलों का सञ्चालन

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रजनीश मौर्या blog4help के डिजाईन, डेवेलपमेंट और सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन के विशेषज्ञ है, ये इस साईट के एडमिन भी है| इन्हें वेबसाइट ऑप्टिमाइज़ करना और आर्टिकल लिखना बहुत ही पसंद है|

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